बॉलीवुड में लोककथाओं और भारतीय लोकविश्वासों को हॉरर और फैंटेसी के साथ जोड़कर कहानियां कहने का चलन लगातार बढ़ा है। इसी कड़ी में निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा की फिल्म ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ बिहार के एक गांव और वहां के जंगल से जुड़ी रहस्यमयी मान्यता को कहानी का आधार बनाती है। फिल्म में प्रकृति, आस्था, अंधविश्वास और आधुनिक विकास के बीच टकराव को हॉरर-कॉमेडी के अंदाज में पेश करने की कोशिश की गई है।
क्या है कहानी?
फिल्म की कहानी ऋषि और ममता के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों मुंबई में रहते हैं और लंबे समय से माता-पिता बनने की कोशिश कर रहे हैं। छठ पूजा के दौरान वे अपने पुश्तैनी गांव पहुंचते हैं। गांव में रहने वाले परिवार और दोस्तों के बीच उन्हें स्थानीय परंपराओं और जंगल से जुड़ी कई पुरानी मान्यताओं के बारे में पता चलता है।
गांव के लोग सूर्यास्त के बाद जंगल में जाने से बचते हैं। ऋषि इन बातों को अंधविश्वास मानता है। इसी बीच जंगल के एक हिस्से को काटकर रास्ता बनाने की कोशिश और जमीन से जुड़े विवाद कहानी को आगे बढ़ाते हैं। जब ऋषि खुद सूर्यास्त के बाद जंगल में पहुंचता है, तब उसके सामने ऐसे रहस्य आने लगते हैं, जो उसके तर्क और विश्वास दोनों को चुनौती देते हैं।
कैसी है फिल्म?
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका बेसिक आइडिया है। बिहार की लोकमान्यता, जंगल और वन देवी की अवधारणा को हॉरर के साथ जोड़ना कहानी को एक अलग पहचान देता है। पहला भाग धीरे-धीरे माहौल तैयार करता है और दर्शकों के मन में यह सवाल बनाए रखता है कि आखिर जंगल में शाम के बाद जाने पर रोक क्यों है।
हालांकि, इंटरवल के बाद फिल्म की रफ्तार और कहानी की पकड़ कमजोर पड़ती दिखाई देती है। कई घटनाएं प्रभाव तो पैदा करती हैं, लेकिन उनके बीच का जुड़ाव उतना मजबूत नहीं लगता। विकास और परंपरा के संघर्ष के साथ मानवीय लालच को जोड़ने की कोशिश दिलचस्प है, लेकिन स्क्रीनप्ले इसे पूरी तरह प्रभावी ढंग से विकसित नहीं कर पाता।
जंगल की लोकेशन और सिनेमैटोग्राफी फिल्म के रहस्यमयी माहौल को मजबूत करती है। कुछ VFX सीक्वेंस भी अच्छे लगते हैं। वहीं मनीष पॉल और सुलभा आर्या से जुड़े हिस्से कहानी में हल्के-फुल्के हास्य का संतुलन बनाए रखते हैं।
क्लाइमैक्स में कहानी को एक बड़े रहस्योद्घाटन तक ले जाने की कोशिश की गई है, लेकिन देवी की बैकस्टोरी और कुछ घटनाएं पूरी तरह सहज नहीं लगतीं। यही वजह है कि अंत तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म का असर शुरुआती हिस्से जैसा नहीं रह जाता।
एक्टिंग कैसी है?
सिद्धार्थ मल्होत्रा ने ऋषि के किरदार में अच्छा काम किया है। उनके किरदार में कहानी के साथ आने वाला बदलाव अभिनय में नजर आता है। तमन्ना भाटिया भी भावनात्मक दृश्यों में प्रभाव छोड़ती हैं और दोनों की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री कहानी को सपोर्ट करती है।
सुनील ग्रोवर ने नकारात्मक किरदार में अलग रंग दिखाने की कोशिश की है। अनूप सोनी और श्वेता तिवारी अपने-अपने किरदारों में सहज नजर आते हैं। मनीष पॉल फिल्म के कॉमिक हिस्से को संभालते हैं।
संगीत और तकनीकी पक्ष
फिल्म का बैकग्राउंड और जंगल का विजुअल ट्रीटमेंट इसके माहौल को बनाने में मदद करता है। गानों में ‘समझो ना’, ‘ठुमक ठुमक’ और ‘छठी मैया’ कहानी के अलग-अलग मूड के साथ फिट बैठते हैं।
क्यों देखें?
अगर आपको लोककथाओं पर आधारित हॉरर-कॉमेडी फिल्में पसंद हैं और सिद्धार्थ मल्होत्रा-तमन्ना भाटिया की जोड़ी को एक अलग तरह की कहानी में देखना चाहते हैं, तो ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ एक बार देखी जा सकती है। हालांकि, फिल्म से बहुत ज्यादा उम्मीद रखने पर स्क्रीनप्ले और क्लाइमैक्स कुछ निराश कर सकते हैं।