पंकज कुमार | ब्यूरो बेगूसराय
मीडिया दर्शन/बेगूसराय: कभी बेगूसराय के गांवों में लगभग हर दरवाजे पर गाय-भैंस बंधी नजर आती थीं। पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा था। लेकिन चारा, भूसा, दवा और पशुओं के रखरखाव की बढ़ती लागत के बीच छोटे किसानों के लिए दूध का कारोबार पहले जैसा लाभकारी नहीं रह गया है। कई परिवारों ने पशुपालन कम कर दिया है या पूरी तरह छोड़ दिया है।
दूसरी ओर, गांव से लेकर शहर तक दूध, पनीर, खोवा और मिठाई की दुकानों की संख्या लगातार बढ़ती दिखाई देती है। ऐसे में एक सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है—जब स्थानीय स्तर पर पशुपालन घट रहा है तो बाजार की बढ़ती दूध की मांग पूरी कैसे हो रही है?
गांव में पशु कम, बाजार में दूध ज्यादा—सवाल आपूर्ति और गुणवत्ता दोनों पर
देश में दूध उत्पादन के आधिकारिक आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं। पशुपालन एवं डेयरी विभाग के अनुसार वर्ष 2024-25 में भारत का दूध उत्पादन 247.87 मिलियन टन रहा, जबकि 2023-24 में यह 239.30 मिलियन टन था। इसी अवधि में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 485 ग्राम प्रतिदिन तक पहुंच गई।
इसलिए केवल गांवों में पशुओं की संख्या घटने को बाजार में उपलब्ध दूध की कमी या मिलावट का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता। दूध की आपूर्ति संगठित डेयरी, दूसरे क्षेत्रों से आने वाले दूध, सहकारी संस्थाओं और अन्य स्रोतों से भी होती है।
लेकिन स्थानीय बाजार में बिकने वाले दूध और दूध से बने उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर सवाल जरूर गंभीर हैं। मिलावट की आशंका वाले मामलों में वैज्ञानिक जांच ही यह तय कर सकती है कि किसी नमूने में नियमों के विरुद्ध पदार्थ मौजूद हैं या नहीं।
यूरिया-कास्टिक सोडा के दावे की जांच जरूरी
दूध में यूरिया या अन्य पदार्थों की मिलावट को लेकर समय-समय पर शिकायतें और जांच सामने आती रही हैं। FSSAI ने दूध में यूरिया की मिलावट की पहचान के लिए परीक्षण संबंधी सामग्री भी जारी की है।
हालांकि किसी दुकान, डेयरी या क्षेत्र के दूध को जांच रिपोर्ट के बिना “केमिकल वाला दूध” या “जहर” कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। इसके लिए नमूना लेकर अधिकृत प्रयोगशाला में परीक्षण और उसकी रिपोर्ट जरूरी है।
FSSAI देशभर में दूध की गुणवत्ता की निगरानी के लिए National Milk Quality Monitoring System संचालित करता है और समय-समय पर दूध तथा दूध से बने उत्पादों के सर्वे भी कराता है।
त्योहारों में बढ़ जाती है निगरानी
दूध और दूध से बने उत्पादों की मांग त्योहारों के दौरान बढ़ जाती है। इसी वजह से खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की निगरानी भी तेज की जाती है। मार्च 2025 में FSSAI ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को Dairy Analogues पर विशेष निगरानी बढ़ाने का निर्देश दिया था।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ त्योहारों के दौरान होने वाली कार्रवाई पर्याप्त है? उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए नियमित नमूना संग्रह, प्रयोगशाला जांच और नियमों के उल्लंघन पर प्रभावी कार्रवाई जरूरी है।
असली सवाल: उपभोक्ता को कैसे मिले सुरक्षित दूध?
दूध रोजमर्रा के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए इसकी गुणवत्ता पर किसी भी तरह का संदेह उपभोक्ताओं के लिए गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। FSSAI के अनुसार राज्य स्तर पर खाद्य सुरक्षा अधिकारी समय-समय पर खाद्य कारोबारियों का निरीक्षण करते हैं और मिलावट की शिकायत मिलने पर नमूने की जांच की जा सकती है। उपभोक्ता भी खाद्य सुरक्षा विभाग से शिकायत कर सकते हैं।
बेगूसराय जैसे जिलों में जरूरत है कि दूध, पनीर, खोवा और मिठाई के नमूनों की नियमित जांच हो और जांच के परिणाम सार्वजनिक किए जाएं। इससे एक तरफ मिलावट की वास्तविक स्थिति सामने आएगी और दूसरी तरफ ईमानदारी से कारोबार करने वाले दूध विक्रेताओं पर बेवजह संदेह भी नहीं होगा।
ग्राउंड रिपोर्ट का सबसे बड़ा सवाल यही है—गांव में पशुपालन घटने और शहर में दूध की मांग बढ़ने के बीच पूरी सप्लाई चेन आखिर कैसे काम कर रही है? इसका जवाब आंकड़ों, स्थानीय डेयरी नेटवर्क और प्रयोगशाला जांच से ही सामने आ सकता है।