बेगूसराय/बिहार: वीरपुर प्रखंड में दूध की गुणवत्ता और कथित मिलावट को लेकर ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों का दावा है कि क्षेत्र में दूध संग्रह के दौरान केन में ऐसा लिक्विड मिलाया जा रहा है, जिससे दूध जल्दी खराब या फटने से बच सके। हालांकि, इस्तेमाल किए जा रहे पदार्थ की प्रकृति और उसके स्वास्थ्य पर प्रभाव की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।
नौला, डीह, भवानंदपुर, वीरपुर पूर्वी-पश्चिमी, गेन्हरपुर, जगदर, पर्रा, रतन और वभनगामा समेत कई पंचायतों के लोगों ने दूध की गुणवत्ता की जांच कराने की मांग की है। ग्रामीणों के मुताबिक, थन से निकलने के बाद दूध को सीमित समय में सुरक्षित तरीके से संग्रह और परिवहन करना जरूरी है, लेकिन कथित रूप से दूध को लंबे समय तक खराब होने से बचाने के लिए संग्रह केंद्रों पर कुछ पदार्थ मिलाए जा रहे हैं।
बच्चों और बुजुर्गों की सेहत को लेकर चिंता
ग्रामीणों का कहना है कि यही दूध घरों में नियमित रूप से इस्तेमाल होता है और इसे बच्चे, बुजुर्ग, बीमार व्यक्ति तथा प्रसूताएं भी सेवन करते हैं। ऐसे में यदि दूध में किसी प्रतिबंधित या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थ की मिलावट की पुष्टि होती है, तो यह गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य का मामला हो सकता है।
दूध के अलावा दही, पनीर, खोआ और बाजार में बिकने वाली मिठाइयों की गुणवत्ता को लेकर भी लोगों ने जांच की मांग की है।
WHO के नाम पर 2035 तक 87% कैंसर का दावा कितना सही?
ग्रामीणों के बीच यह दावा भी चर्चा में है कि WHO ने चेतावनी दी है कि मिलावट पर रोक नहीं लगी तो वर्ष 2035 तक 87 प्रतिशत लोगों को कैंसर हो सकता है। हालांकि, 2035 तक 87 प्रतिशत लोगों को कैंसर होने संबंधी WHO की ऐसी किसी आधिकारिक चेतावनी की पुष्टि नहीं है। इसलिए इस दावे को तथ्य के रूप में प्रकाशित करने से पहले विश्वसनीय आधिकारिक स्रोतों से सत्यापन जरूरी है।
औचक जांच और लैब टेस्ट की मांग
ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन से वीरपुर क्षेत्र के दूध संग्रह केंद्रों, डेयरियों और मिठाई दुकानों की औचक जांच कराने की मांग की है।
लोगों का कहना है कि विभिन्न स्थानों से दूध और दुग्ध उत्पादों के नमूने लिए जाएं और उन्हें मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा जाए। यदि जांच में किसी प्रतिबंधित या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थ की मिलावट सामने आती है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई की जाए।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि दूध में कथित रूप से मिलाया जा रहा पदार्थ आखिर क्या है और क्या वह खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप है? इसका जवाब वैज्ञानिक जांच और प्रशासनिक कार्रवाई के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।