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पितृपक्ष मेले को लेकर लोग चिंतित, बोले- रेलवे के फ्रेट कोरिडोर निर्माण से होगी परेशानी

औरंगाबाद: पितृपक्ष में पिंडदान कर सनातनी परंपरा को निर्वहन कर रहे लोग 15 दिनों तक चलने वाले इस पक्ष में अपने पितरों की आत्मा के लिए मोक्ष की कामना करते है। पुनपुन नदी का जम्होर स्थित पिंडदान घाट जहां प्रथम पिंडदान दिए जाने की परंपरा है। शास

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satyam kumar sinha संवाददाता, Media Darshan
22 सितंबर 2023, 04:05 PM (22 सितंबर 2023) 315 व्यूज
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औरंगाबाद: पितृपक्ष में पिंडदान कर सनातनी परंपरा को निर्वहन कर रहे लोग 15 दिनों तक चलने वाले इस पक्ष में अपने पितरों की आत्मा के लिए मोक्ष की कामना करते है। पुनपुन नदी का जम्होर स्थित पिंडदान घाट जहां प्रथम पिंडदान दिए जाने की परंपरा है। शास्त्र में भी यह वर्णित है कि भगवान श्री राम ने मां सीता के साथ पुनपुन घाट आकर अपने पितरों को प्रथम तर्पण दिया था। इसके बाद ही उन्होंने गया के फल्गु नदी में पिंडदान के कार्य को सम्पन्न किया था। साल में तीन बार लोग पिंडदान के लिए जम्होर स्थित पुनपुन नदी घाट पर पिंडदानी आते हैं और यहां अपने पितरों का तर्पण करते हैं।पिंडदानी यहां के बाद गया के फल्गु नदी में पितरों का तर्पण कर मोक्ष की कामना करते हैं। जिले के जम्होर पुनपुन घाट पर 28 सितंबर से लेकर 14 अक्तूबर तक पिंडदान का कार्य किया जाना है। परंतु घाट के अस्तित्व पर उत्पन्न हो रहे खतरे से यहां पिंडदान कराने वाले ब्राह्मण चिंतित हैं। ब्राह्मणों का कहना है कि पुनपुन बटाने संगम से लेकर रेलवे ब्रिज तक बालू के उत्खनन कार्य को रोकना होगा। क्योंकि खनन के कार्य रोके जाने के बावजूद ठेला और साइकिल से प्रतिदिन बालू ढोए जा रहे हैं। जिससे नदी के पानी से मिट्टी का कटाव हो रहा है। जिससे घाट धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। पिंडदान का कार्य से जुड़े ब्राह्मण का मानना है कि 15 दिनों तक चलने वाला पिंडदान का कार्य इस वर्ष अच्छा रहेगा। क्योंकि इस वर्ष बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा के अलावे केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों से पिंडदानियों के आने की संभावना है। पुनपुन घाट पर पिंडदानियों को तर्पण करने वाले ब्राह्मण कुंदन पाठक ने बताया कि वर्ष 1975 से पहले रेलवे लाइन और धर्मशाला के पश्चिमी छोर के तरफ के घाट में पिंडदान की सुदृढ और बेहतर व्यवस्था थी। परंतु 1976 में आई प्रलयकारी बाढ़ के कारण घाट तबाह हो गया। जिसके अवशेष आज भी नदी के जलस्तर घटने के बाद देखे जा सकते हैं।

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घाट के समाप्त होने के बाद तत्कालीन जिला प्रशासन के निर्देश पर रेलवे लाइन के उत्तर की तरफ एक वैकल्पिक व्यवस्था बनाई गई थी और यह आश्वासन दिया गया था कि यहां भी घाट की बेहतर व्यवस्था की जाएगी परंतु आज तक कोई ऐसी व्यवस्था यहां नहीं मिल पाई। ब्राह्मणों ने बताया कि रेलवे के द्वारा फ्रेट कोरिडोर का निर्माण कार्य कराया जाना है। लेकिन जमीन अधिग्रहण के बाद मुआवजे की मांग को लेकर किसान कोर्ट चले गए और मामला कोर्ट में अटका हुआ है। यदि सारी बात बन जाएगी तो फ्रेट कॉरिडोर के निर्माण के बाद यह घाट वैकल्पिक घाट भी समाप्त हो जाएगा। कुंदन पाठक ने बताया कि अभी हाल में ही भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक स्थलों को बचाने का अभियान चलाया गया था। वैसी स्थिति में उन्होंने औरंगाबाद के सांसद को भी इस घाट के अस्तित्व को बचाने के लिए एक आवेदन देकर गुहार लगाई थी। लेकिन उनकी गुहार काम नहीं आई। उन्होंने बताया कि राजनीतिक एवं प्रशासनिक उदासीनता का यदि आलम यही रहा तो यहां कभी पिंडदान का घाट हुआ करता था वाली स्थिति बन जाएगी।

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