सासाराम : साइकोसोशल रिसर्च औफ इंडिया पटना ने कई विभूतियों को समाज में उनकी अपूर्व-विशिष्ट कार्यों के द्वारा योगदान देने हेतु यूनिक अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। इन्हें प्रशस्ति-पत्र व प्रतिक चिन्ह प्रदान किये गयें। पटना एवं बेंगलुरू से संचालित साइकोसोशल रिसर्च औफ इंडिया के सेक्रेटरी समाजसेवी डॉ. लता सिंह एवं फाउन्डर प्रसिद्ध चिकित्सक व समाजसेवी डॉ. विप्लव कुमार सिंह ने संयुक्त रूप से बताया की संस्था प्रत्येक वर्ष समाज के सभी क्षेत्रों में अपनी महत्वपूर्ण योगदान देने वाले युवाओं एवं बुद्धिजीवीयों को सम्मानित करती रहती है।
इसी क्रम में हमारी टीम कलानी गाँव, रामगढ़ प्रखण्ड आकर विशिष्ट प्रतिभाशाली बच्चा हर्ष कुमार को भी जाकर सम्मानित किया गया है। ऐसे प्रतिभा सम्पन्न बच्चा को सम्मानित कर संस्था भी गौरवान्वित महसूस कर रही है। खुद चौथी क्लास में पढ़ते हुये दसवीं तक के बच्चों को फ्री में कोचिंग खोलकर पढ़ाना, अपने आप में बड़ी बात है। इसलिए संस्था ने इन्हें यूनिक अचीवमेंट अवार्ड फौर एक्स्ट्राआडिनरी एडुकेशनल वर्क से नवाजा है। संस्था की सचिव डॉ. लता सिंह ने बताया कि इस वर्ष “यूनिक अचीवमेन्ट अवार्ड” से नवाजे जाने वालों में डॉ. उदय नारायण-राँची को एडुकेशनल रिसर्च वर्क के लिये, ब्रह्मकुमारी सरिता सिंहा को क्रियेटिव एडुकेशन, मो. तनवीर कमाल-पटना को ज्यूडिशियल सोशल वर्क, विवेक कुशवाहा-यूपी को क्रियेटिव एडुकेशन, हर्ष कुमार को एक्स्ट्राआरडिनरी एडुकेशनल वर्क, संजय कुमार सिंह को सोशल वर्क, ठाकुर ऋषिकेश सिंह को सोशल वर्क, राजेश कुमार-गया को भी सोशल वर्क व छपरा के डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिन्हा को भी सोशल वर्क तथा कुछ अन्य व्यक्तियों को भी अवार्ड दिये गयें हैं।(यूनिक अचीवमेंट अवॉर्ड से )
विदित हो कि संस्था विभूतियों के घर जाकर यह अवार्ड सौंपती है तथा सुदूर प्रदेशों में संस्था अपने प्रतिनिधि सदस्यों के माध्यम से इस जटिल कार्य को करती है। डॉ. लता सिंह व डॉ. विप्लव कुमार सिंह चयन प्रक्रियाओं के बाद पुरस्कार वितरण कार्य में अपनी निस्वार्थ भूमिका बखूबी अपने खर्चे से निभाते रहें हैं। संस्था के संरक्षक चीफ इंजी. एमके सिंह का कहना है कि घर या कार्यस्थल पर जाकर अवार्ड सौंपना जटिलता लिये हुये तथा ज्यादा खर्चा वाला कार्य हो जाता है, फिर भी ऐसे कार्यों को करने से भी संस्था अपने ऊर्जा में बिलकुल कमी नहीं आने देती है। विभूतियों को बुलाकर सम्मान देने के बजाये उनके पास जाकर सम्मानित करना प्रेमभाव को ज्यादा दर्शाता है तथा विभूतियों के अनावश्यक खर्चा व समय को भी बचाता है। इसलिए संस्था ने यह जटिल बीड़ा उठाया है।
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