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संसार से मोहभंग किए बिना परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती – जीयर स्वामी

ROHTAS : नौहट्टा बीआरसी भवन के सामने जीयर स्वामी ने  प्रवचन करते हुए कहा कि संसार से मोहभंग किए बिना परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती। एक तरफ संसार से मोह और दूसरी तरफ परमात्मा की प्राप्ति ये कभी संभव नहीं है। यह एक नदी के दो किनारे हैं। इ

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satyam kumar sinha संवाददाता, Media Darshan
26 अक्टूबर 2022, 12:40 PM (26 अक्टूबर 2022) 639 व्यूज
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ROHTAS : नौहट्टा बीआरसी भवन के सामने जीयर स्वामी ने  प्रवचन करते हुए कहा कि संसार से मोहभंग किए बिना परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती। एक तरफ संसार से मोह और दूसरी तरफ परमात्मा की प्राप्ति ये कभी संभव नहीं है। यह एक नदी के दो किनारे हैं। इसलिए परमात्मा प्राप्ति के लिए संसार से मोहभंग करना ही होगा। जितनी भी सुख सुविधाओं की इच्छा करेंगे उतना ही आप परमात्मा से दूर होते चले जायेंगे। संसार में रहिए परिश्रम कीजिये। जीविकोपार्जन कीजिये, गृहस्थ आश्रम में रहिये लेकिन ध्यान परमात्मा में लगाये रखें।
तभी कल्याण संभव है। प्रकाश वही देता है, जो स्वयं प्रकाशित होता है। जिसका इंद्रियों और मन पर नियंत्रण होता है, वही समाज के लिए अनुकरणीय होता है। जो इंद्रियों और मन को वश में करके सदाचार का पालन करता है, समाज के लिए वही अनुकरणीय होता है। केवल वेश-भूषा, दाढी-तिलक और ज्ञान-वैराग्य की बातें करना संत की वास्तविक पहचान नहीं। उन्होंने कहा कि विपत्ति में धैर्य, धन, पद और प्रतिष्ठा के बाद मर्यादा के प्रति विशेष सजगता, इंद्रियों पर नियंत्रण और समाज हित में अच्छे कार्य करना आदि साधु के लक्षण हैं। उन्होंने कहा कि मूर्त्ति की पूजा करनी चाहिये। मूर्त्ति  में नारायण वास करते हैं। मूर्ति भगवान का अर्चावतार हैं। मंदिर में मूर्त्ति और संत का दर्शन आंखें  बंद करके नहीं करना चाहिये। मूर्त्ति से प्रत्यक्ष रुप में भले कुछ न मिले लेकिन मूर्त्ति-दर्शन में कल्याण निहित है। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मूर्त्ति से ज्ञान और विज्ञान को प्राप्त किया।

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श्रद्धा और विश्वास के साथ मूर्त्ति का दर्शन करना चाहिये। स्वामी जी ने कहा कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मत्सर से बचना चाहिये। ये आध्यात्मिक जीवन के शत्रु हैं। मत्सर का अर्थ करते हुए स्वामी जी ने बताया कि उसका शाब्दिक अर्थ द्वेष-विद्वेष एवं ईर्ष्या भाव है। दूसरे के हर कार्य में दोष निकालना और दूसरे के विकास से प्रसन्न नहीं होना मत्सर है। मानव को मत्सरी नहीं होना चाहिये। अगर किसी में कोई छोटा दोष हो तो उसकी चर्चा नहीं करनी चाहिये। जो लोग सकारात्मक स्वाभाव के होते हैं, वे स्वयं सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं। इसके विपरीत नकारात्मक प्रवृत्ति  के लोगों का अधिकांश समय दूसरे में दोष निकालने और उनकी प्रगति से ईर्ष्या करने में ही व्यतीत होती है।(संसार से मोहभंग किए)
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