कोरोना की वैश्विक राजनीति और कठपुतली नेतृत्व

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चैनपुर। बात यहाँ से शुरू करते हैं कि दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क और सबसे बड़े लोकतंत्र के दो ताकतवर लोग मिले।ताकतवर आदमी आने पहले धमकियों के जरिये माहौल बनाता है।दुनिया में तब कोरोना का कहर बरस रहा था।दोनों जगह इस कहर से बचने के लिए क्या हो रहा था? इस मुलाकात में कोरोना कहर से बचने के लिए क्या बात हुई? और फिर आइये एक दिन बाद ही भारत में कहा जाता है कि यह कोई खास खतरा नहीं है बस सावधान रहें।ठीक उसके दूसरे दिन उसी श्रीमुख से इसे वैश्विक खतरा बताया जाता है। और अब कोरोना पर राजनीति नहीं करें ऐसा जो कह रहे हैं वही राहत पैकेट पर नेताओं की तस्वीरें और नारे भी छपवा रहे हैं।अरे कपडगंझुओं कमसे कम छपाई की लागत को भी राहत में ही दे देते। परन्तु असली राजनीति यह नहीं है। कोरोना की असली राजनीति कुछ और है।उसे समझने के लिए कुछ दूर जाकर फिर वापस लौटना होगा। वुहान एक बड़ा इंडस्ट्रियल कस्बा है जहां पर एक नये तरह का निमोनिया रिपोर्ट हुआ जिसके कारण और उसके जीवाणु के बारे में अभी तक की मेडिकल पढ़ाई कुछ ख़ास नहीं जानती थी। वुहान में इसके केस बढ़ते जा रहे थे। अमेरिका, जो कि बाज़ार में चीन के डोमिनेंट पोज़ीशन से पिछले दस साल से भयानक रूप से पीड़ित था, ने इसे मौक़े की तरह लिया और चीन को बदनाम करने व उसे व्यापारिक झटका देने के लिये इसे चाइनीज वाइरस के नाम प्रचारित करके पेनिक क्रिएट करना चाहा। परिणाम यह हुआ कि सभी देशों ने चीन के साथ व्यापार सस्पेंड कर दिया और ठीकरा चीन के सिर पर फोड़ने की तैयारी कर ली। चीन थोड़ा ज़्यादा तेज़ निकला। विश्व स्वास्थ्य संगठन का हालिया चीफ़ ऐसे देश से है जो चीन के साथ खड़ा है। चीन ने WHO से इसे पेंडेमिक घोषित करवा दिया और अपने ऊपर होने वाले सभी इक्स्पोर्ट डिफ़ॉल्टर ऑब्लिगेशनस को पेंडेमिक खाते में डलवा दिया। अब चूँकि अमेरिका सहित कोई भी पश्चिमी देश चीन का पेनाल्टी लगा कर आर्थिक तौर पर कोई नुक़सान नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने लॉकडाउन को पेनिसिया बना कर प्रचारित किया। क्योंकि पिछले तीन महीने में चीन से बहुत कम सामान बाहर आ रहा था और अधिकांश देश कच्चे माल और फिनिश्ड प्रोडक्ट के लिये सिर्फ़ और सिर्फ़ चीन पर आश्रित हैं। बिना कच्चे माल और फिनिश्ड प्रोडक्ट के बाज़ार का लॉकडाउन तो वैसे ही हो जाता और इससे ग्लोबलाइजेशन की पोल भी खुल जाती। इसलिये अमेरिका समेत सारी पूंजीपरस्त मीडिया ने इसे पेंडेमिक के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया, ताकि आम लोगों को इस ग्लोबलाइजेशन के पॉलिसी फेल्योर का जवाब न देना पड़े और यह सब प्रकृति या चीन के माथे मढ़ दिया जाए। विषगुरु (खेद के साथ जबकि भारत की महानता को मैं स्वीकार करता हूँ जो इसके मानवतावादी चरित्र में है)भारत में तो बाकायदे आईटी सेल का कारोबार भी शुरू करा दिया गया है। यही सब अधिकांश देशों ने किया। आपको न्यूयॉर्क सिटी के बहुत से लोगों के पर्सनल अकाउंट पर ऐसे वीडियो मिल जाएँगे कि जिसमें वो बता रहे हों कि किसी भी टेस्ट सेंटर पर कोई लाइन नहीं है न ही टेस्ट हो रहे हैं। हर देश में पुलिस ओवर-एलर्ट है जो कि पैंडेमिक नहीं बल्कि सीधे तौर पर पॉलिसी फेल्योर की तरफ़ इशारा करता है। भारत में भी जिस मज़ाक़िया लहजे में इसे लागू किया गया वह खुद बताता है कि यह पेंडेमिक से ज़्यादा पॉलिसी फेल्योर का केस है। आप क्रोनोलॉजी समझिए। इंडिया में सरकारों को अब हेल्थ प्रोफ़ेशनल्स को इन्फेक्टेड घोषित करना पड़ रहा है, ताकि लोग डरे रहें। जबकि नये मरीज़ आ ही नहीं रहे (कमसेकम जैसा जनसंख्या अनुपात,घनत्व के आधार पर आना चाहिए)और न ही इटली समेत कोई भी देश, किसी भी दिन की मौतों का आँकड़ा उसी तारीख़ के पिछले साल की मौतों के आकड़ों के साथ प्रचारित कर रहा है। जर्मनी के वित्त मन्त्री की आत्महत्या के बारे में भी आशंका स्लोडाऊन को लेकर है। कच्चे तेल की क़ीमत 10 डॉलर प्रति बैरल से नीचे जायेगी और हो सकता है कि अगले दो साल के लिए तेल प्रोडक्शन बन्द कर दिया जाये। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि कोरोना का खतरा साधारण खतरा है और हम बेपरवाह घूम सकते हैं।परन्तु राजनीति शास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते मेरा यह भी फर्ज है कि कोरोना पर चल रहे वैश्विक राजनीति का पर्दाफाश करूँ। इस पोस्ट हेतु विकास आनन्द से प्रेरणा और कुछ सामग्री मिली मैं उनके प्रति आभारी हूँ। वस्तुतः हमारी और आपकी आस्था जिसके पास गिरवी होती है वह खुद भी कहीं गिरवी होता है। हम कठपुतली को सेनापति कह रहे होते हैं और हमें यह पता भी नहीं होता। यहाँ पोस्ट पर अनेक लिंक दे रहा हूँ आप वहां जाकर इस रहस्य के अन्य परतों को खोल सकते हैं। 
नोट- असहमत होने से पूर्व यह विचार करें कि यह वायरस यदि भारत से या अमेरिका से फैला होता तो आज क्या स्थति होती।दरअसल चीन ने ग्लोबलाईजेशन के अवसर को जिस तरह से भुनाया है वह अद्वितीय है।और चीन का चरित्र कहीं से भी अमेरिका के चरित्र से शुद्ध नहीं है।दोनों ही पापी हैं।परन्तु दो पापियों का गठजोड़ बन नहीं पा रहा है।उम्मीद थी कि ग्लोबलाईजेशन वह गठजोड़ बना देगा किन्तु हुआ उल्टा।दोनों पापियों से दुनिया को बचने की जरूरत है।परन्तु छोटे छोटे पापी मिलकर ऐसा करना नहीं चाहते।सिर्फ चाहते यह हैं कि दुनिया का कैप्टन या यह रहे या वह रहे। कोरोना भारत छोड़ो और ग्लोबलाईजेशन दुनिया छोडो का विमर्श साथ साथ चलना चाहिए।
– रामकृत सिंह

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