कोरोना वायरस के कहर से टूटा कुम्हारों के कमर : अविनाश देव

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पलामू।  कोरोना से निबटने के लिए हुए लॉक डाउन में गर्मी के मद्देनजर बनाया गया माटी के मटका सहित अन्य बर्तन धरा का धरा रह गया जिससे कुम्हारों को आर्थिक रूप से कमर टुट गया। झारखंड में वास करने वाले बाईस लाख कुम्हार में से एक बड़ा हिस्सा जन्मजात पेशा से जुड़े हैं जिनका दाल रोटी सिर्फ और सिर्फ माटी के बर्तन के बदौलत चलता है। यह बातें झारखंड माटीकला बोर्ड, झारखंड सरकार के सदस्य अविनाश देव ने कही। उन्होंने कहा  कि यही कारण है कि झारखंड में माटीकला बोर्ड का गठन हुआ ताकी कुम्हारों का दिन बहुरे। जातिय तुलना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से एकदम पिछड़ा है। झारखंड के बड़े शहरों में पेशागत माटी के बर्तन के दुकानदारों को जो दुकान पर ही निर्भर था, लॉक डाउन से भुखमरी के कगार पर हैं। अन्य दैनिक उपभोक्ता वस्तुओं के अभाव झेल रहा है। बच्चे बिलबिला रहे हैं। वैसे लोगों को त्वरीत राहत की जरूरत है। अलग से आर्थिक सहायता दी जाये। इस भयावह स्थिति में हम सरकार से मांग करते हैं कि जिस तरह किसानों से समर्थन मूल्य पर अनाज की खरीदारी होती है उसी तरह कुम्हारों से माटी के मटका व अन्य बर्तन की खरीदारी हो। जो कुम्हार अपनी कला कौशल के बावजूद बाज़ार उपलब्ध नहीं रहने, किसी प्रकार के सरकारी सहायता नहीं मिलने से पलायन कर गया । उसे चिन्हित कर नरेगा कार्ड की तरह कार्ड बना कर माटीकला बोर्ड द्वारा माटी के बर्तन के फैक्टरी लगा रोजगार दिया जाय और एक्सपोर्ट करने की व्यवस्था हो। राशनकार्ड जिसका नहीं है उसे बनाया जाय। ईंट भट्ठा, टाइल्स कुल्हड़, बोतल, कुकर फ़्रिज़ का व्यापक उत्पादन कर प्लास्टिक मुक्त मिट्टीयुक्त झारखंड की दिशा में बढ़ा सकता है जिससे रोजगार का सृजन होगा। गर्मी एवं लॉक डाउन के मद्देनजर बाहर फंसे प्रवासी मजदूरों को लाने एवं समुचित सुविधा प्रदान किया जाय। प्रत्येक कुम्हार बहुल इलाकों, प्रखंड मुख्यालय स्तर पर स्थान चिन्हित कर निश्चित अवधि के लिए मिट्टी निर्मित बर्तन के विक्रय केंद्र खोला जाय। मिट्टी की उपलब्धता, जनवितरण प्रणाली की दुकान से राशन जैसे सस्ते ईंधन 
जला वन दी जाय। महिलाओं को अतिरिक्त सुविधाओं से कार्य में बड़े पैमाने पर जोड़ा जाय। 

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